रीवा विंध्य के प्रसिद्ध गीतकार स्व. शिवाशंकर त्रिपाठी शिवाला की जयंती पर बघेली सेवा मंच रीवा द्वारा बघेली गीत गोष्ठी का आयोजन न्यू बस स्टैंड के पास स्थित मंगलम् कालेज आफ टेक्नोलॉजी के सभागार में किया गया। मुख्य अतिथि पूर्व कुलपति प्रो. डॉ. एनपी पाठक रहे एवं अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद चन्द ने की। मुख्य अतिथि डॉ. पाठक ने बघेली सेवा मंच द्वारा बघेली शब्दों को सहेजने, संवर्धन और विस्तार तथा कविता की विभिन्न विधाओं पर कार्यशाला के आयोजन की दिशा में किए जा रहे प्रयासों की सराहना की। वहीं डॉ. चन्द्र ने कहा कि बघेली बोली की मिठास बघेलखण्ड ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश से भी बाहर निकल कर उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश, बिहार आदि राज्यों के साथ ही नेपाल तक महसूस की जा रही है। ऐसे व्यापक क्षेत्र की सर्वप्रिय बोली बघेली को आज अपने जन्मस्थली पर ही अपनी पहचान बनाए रखने के लिए संघर्ष न करना पड़ रहा है। हम सब बघेली लेखकों, साहित्यकारों को निरंतर बघेली के संरक्षण के प्रयास में जुटना होगा। कार्यक्रम का संचालन भृगुनाथ पाण्डेय भ्रमर ने किया।
स्व. शिवाला की पत्नी का सम्मान
कार्यक्रम के दौरान स्व. शिवालाजी की पत्नी इन्द्रकली त्रिपाठी को बघेली सेवा मंच द्वारा शाल, श्रीफल और श्रीमद भागवत गीता की पुस्तक देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर स्व. शिवाला के पुत्र रजनीश त्रिपाठी, मनीष त्रिपाठी के साथ ही मंगलम् कालेज आफ टेक्नोलॉजी के छात्र-छात्राएं एवं शिवाला के पारिवारिक सदस्यों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।
बघेली काव्य गोष्ठी में सीधी के गीतकार विनय मिश्र ने अपनी कविता कुछ यू पढ़ी- दिआ जरै न जेखे घर म, ओखा जोन्ह तरैया हय। जेकर कोऊ नहीं गोसइयाँ, ओखर राम रखैया हय। वहीं कवि सुधाकांत बेलाला ने मां की ममता पर ये गीत पढ़ा-भुइयां पर देउतन से निकही, सबके चाहै हली-भली। कवि शिवानंद तिवारी ने विसंगतियों पर व्यंग्य किया- जउनय मन मा आबत्थय तऊं बूंके परे हये पढ़ा। संचालन कर रहे भृगुनाथ पाण्डेय ने व्यंग्य गीत पढ़ा-गुरू अउर चेला एक मेरय, दूनउ बड़े खधाई। इसके अलावा कवि मैथिली शरण शुक्ल, स्नेहा त्रिपाठी, दुर्गा प्रसाद चतुर्वेदी, विजय शर्मा, नागेंद्र मणि, हसमत रीवानी, ओमप्रकाश मिश्र, डॉ. अभय मिश्र और नारायण डिगवानी नें शिवालाजी को श्रद्धा सुमन अर्पित किया।

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