रीवा। समाजशास्त्र विभाग, टी.आर.एस. कॉलेज, रीवा में विश्व किशोर मानसिक कल्याण दिवस के अवसर पर एक विशेष व्याख्यान एवं संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ छात्रा संध्या वर्मा द्वारा मां सरस्वती की वंदना से हुआ, जिसके बाद अतिथियों ने दीप प्रज्वलन एवं पुष्प अर्पण कर कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।
कार्यक्रम का संचालन एवं उद्देश्य
प्राचार्य डॉ. अर्पिता अवस्थी के निर्देशन में आयोजित इस कार्यक्रम का संयोजन प्रो. अखिलेश शुक्ल (विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र) तथा सह-संयोजन डॉ. महानन्द द्विवेदी ने किया। प्रो. अखिलेश शुक्ल ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डिजिटल युग में किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर एवं समयबद्ध मुद्दा बन चुका है। उन्होंने जोर दिया कि समय रहते समाधान खोजना और किशोरों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
वक्ताओं के प्रमुख विचार
सह-संयोजक डॉ. महानन्द द्विवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि किशोर मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। सकारात्मक और सहायक माहौल ही किशोरों को मानसिक रूप से मजबूत बना सकता है।मुख्य वक्ता डॉ. धीरेंद्र मिश्रा (एसोसिएट प्रोफेसर, मनोरोग विभाग, मेडिकल कॉलेज सतना) ने डिजिटल युग की चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। उन्होंने विचारणीय प्रश्न उठाया—क्या हम 24 घंटे बिना मोबाइल के रह सकते हैं? क्या डिजिटल डिटॉक्स संभव है?डॉ. मिश्रा ने आंकड़ों के हवाले से बताया कि भारत में लगभग 253 मिलियन किशोर हैं, जिनमें से 40 प्रतिशत से अधिक नियमित रूप से इंटरनेट का उपयोग करते हैं। स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच ने अवसर तो बढ़ाए हैं, लेकिन शहरी-ग्रामीण डिजिटल खाई को भी उजागर किया है। 10–19 वर्ष की आयु पहचान निर्माण और भावनात्मक संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण दौर होता है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता पूर्ण विकसित नहीं होती, इसलिए डिजिटल प्रभाव अधिक गहरा पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर डिजिटल प्रभाव
अत्यधिक डिजिटल उपयोग से तनाव, अवसाद, चिंता और अकेलापन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। मुख्य वक्ता ने स्पष्ट किया कि तकनीक स्वयं में बुरी नहीं है, बल्कि उसका अनुचित उपयोग हानिकारक होता है। उन्होंने संतुलित डिजिटल उपयोग, अभिभावक-शिक्षक सहयोग तथा जागरूकता को इन चुनौतियों से निपटने का प्रमुख उपाय बताया।
कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में डॉ. शाहेदा सिद्दीकी, डॉ. फरजाना बानो, डॉ. प्रियंका पांडे, डॉ. निशा सिंह, डॉ. गुंजन सिंह, डॉ. प्रियंका तिवारी, डॉ. रावेन्द्र सिंह, डॉ. मिर्जा अख्तर बेग, डॉ. ब्रम्हेन्द्र मिश्रा, डॉ. अश्वनी द्विवेदी, योगेश निगम तथा रत्नेश मिश्रा सहित अन्य शिक्षकों ने सक्रिय सहभागिता की। छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक प्रश्न पूछे, जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तार से समाधान किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. फरजाना बानो ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन डॉ. प्रियंका पांडे ने व्यक्त किया।
प्राचार्य डॉ. अर्पिता अवस्थी के निर्देशन में आयोजित इस कार्यक्रम का संयोजन प्रो. अखिलेश शुक्ल (विभागाध्यक्ष, समाजशास्त्र) तथा सह-संयोजन डॉ. महानन्द द्विवेदी ने किया। प्रो. अखिलेश शुक्ल ने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि डिजिटल युग में किशोरों का मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर एवं समयबद्ध मुद्दा बन चुका है। उन्होंने जोर दिया कि समय रहते समाधान खोजना और किशोरों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
वक्ताओं के प्रमुख विचार
सह-संयोजक डॉ. महानन्द द्विवेदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि किशोर मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। सकारात्मक और सहायक माहौल ही किशोरों को मानसिक रूप से मजबूत बना सकता है।मुख्य वक्ता डॉ. धीरेंद्र मिश्रा (एसोसिएट प्रोफेसर, मनोरोग विभाग, मेडिकल कॉलेज सतना) ने डिजिटल युग की चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक ने जीवन को सरल बनाया है, लेकिन किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं। उन्होंने विचारणीय प्रश्न उठाया—क्या हम 24 घंटे बिना मोबाइल के रह सकते हैं? क्या डिजिटल डिटॉक्स संभव है?डॉ. मिश्रा ने आंकड़ों के हवाले से बताया कि भारत में लगभग 253 मिलियन किशोर हैं, जिनमें से 40 प्रतिशत से अधिक नियमित रूप से इंटरनेट का उपयोग करते हैं। स्मार्टफोन की बढ़ती पहुंच ने अवसर तो बढ़ाए हैं, लेकिन शहरी-ग्रामीण डिजिटल खाई को भी उजागर किया है। 10–19 वर्ष की आयु पहचान निर्माण और भावनात्मक संवेदनशीलता का महत्वपूर्ण दौर होता है, जिसमें निर्णय लेने की क्षमता पूर्ण विकसित नहीं होती, इसलिए डिजिटल प्रभाव अधिक गहरा पड़ता है।
मानसिक स्वास्थ्य पर डिजिटल प्रभाव
अत्यधिक डिजिटल उपयोग से तनाव, अवसाद, चिंता और अकेलापन जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। मुख्य वक्ता ने स्पष्ट किया कि तकनीक स्वयं में बुरी नहीं है, बल्कि उसका अनुचित उपयोग हानिकारक होता है। उन्होंने संतुलित डिजिटल उपयोग, अभिभावक-शिक्षक सहयोग तथा जागरूकता को इन चुनौतियों से निपटने का प्रमुख उपाय बताया।
कार्यक्रम में सक्रिय भागीदारी
कार्यक्रम में डॉ. शाहेदा सिद्दीकी, डॉ. फरजाना बानो, डॉ. प्रियंका पांडे, डॉ. निशा सिंह, डॉ. गुंजन सिंह, डॉ. प्रियंका तिवारी, डॉ. रावेन्द्र सिंह, डॉ. मिर्जा अख्तर बेग, डॉ. ब्रम्हेन्द्र मिश्रा, डॉ. अश्वनी द्विवेदी, योगेश निगम तथा रत्नेश मिश्रा सहित अन्य शिक्षकों ने सक्रिय सहभागिता की। छात्र-छात्राओं ने उत्साहपूर्वक प्रश्न पूछे, जिनका मुख्य वक्ता ने विस्तार से समाधान किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन डॉ. फरजाना बानो ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन डॉ. प्रियंका पांडे ने व्यक्त किया।

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